Thursday, September 4, 2008

" LOVE or LUST "


This one is dedicated to myself (chau ) , gaurav(chitku), sankalan (sanki) , ankit (panchava) as its our common feeling expressed through my words.....dedicated to all our endless backbench bhaat.....dedicated to all amazing discussions on weird issues and even more weird outcomes :D.....


Often while, I am passing by the road,
there comes a girlish sound,
and i, cant help my eyes,
they just impulsively turn around.

and its not the story,for some specific girl,
that my roaming eyes seek,
this habit grew during summer holidays,
and is now at its peak.

staring and stalking carelessly,
at every other cute,beautiful girl
some black hairs ,some blue eyes
some sexy ear rings of pearl
some innocent moves,
some careless whispers
some sweet SNAPS getting blurred
some pink tops,
some striped sandals
some perfume from the other world

And the time slips by fast,
drinking "FROOTI", playing "INDORE" games,
i wish i could let u know about some of these girls ,
but the list has infinite names !!

but the question my dear frnd is that!!
is there some gain out of being "lost and found"?
or the RAINBOW will never come out of SHADOWS
I am just wasting time and mocking around !

guys please help me,
how do know if its really love,
will some angel come and pinch me,
from the world unnatural above.

will this dilemma ever burst?
if yes, will it water all my thirst
its been a long time the question is unanswered
how do u differentiate "LOVE and LUST"?




Sunday, August 17, 2008

through the eye's of a very old man.............


गुजरी थी जिन राहों में उमर की कम्पन,
वो राहें अजनबी निकली,
मंजिल पर पहुच आराम पायेगे सोचा था,
पर मंजिलें भी खुदकशी निकली .

दोस्ती के हज़ार फरमान उडेल कर कानों मे,
वफादारी के दामन से लिपटे हाथों में,
ऐन मौके पर ही पलट गए वोह, क्योंकि,
हमारे दोस्तों की दुश्मनों से दोस्ती निकली.

उमर के पड़ाव कुछ यूँ बीत गए,
मानों पलकों पे सारे मौसम रीत गए ,
पतझड़ और सावन के बीच रह खोजते,
मासूमियत की चादर ओढे ज़िन्दगी निकली।

ऐसे भी दिन थे
की, ऑंचल की छाओं में माँ की,
सारी दूनिया समेट रखी थी हमने ,
उम्र बढते वो सपनो की दूनिया भी,
रेत के घरों सी बनावटी निकली .

Thursday, May 1, 2008

A WORK OF ART

Hello to the reader, greeting from my heart,
Now, I will describe something, keeping description apart,
It’s something very nasty but a very rare view,
Not many can understand it, as details are few
But I bet you will be thrilled and excited if you are smart
Ahh, yes I will write about an exceptional work of art
It’s nothing but a painting, an awesome molded piece
Made by a soldier, who’s now enjoying eternal peace
It looks like a window, which opens in vivid space
With sun shining bright, and birds flying with pace

Yet another closer look, your mind will get a loop
The sun is marked 60, and birds form different group
In between there are dark clouds trying to overshadow sun
Still the birds seek height, seems to have good fun
With a snowcapped mountain and river with no name
It also has a vast desert, occupying the other side of frame
Covered by deep blue water on “3” consecutive sides
I see a man and a loin on which the man rides
I also saw a peacock’s dancing without rain
“What all crap is this”, I thought one again

Another look to the painting, took me to surprise
There were also some couples
who looked aged , happy and wise
Some men wore turban and “kurta paijama” bright
Some other looked Brahmans, wearing dhoti white
There were also some patches of rice wheat and stuff
These all meant something
but to guess the theme was tough
A woman holding charkha, and another with laptop
There was also a postman, holding mobile and waiving top
And all of them were walking towards a golden pole
The man on loin was leading them to the goal

My dear reader countrymen, haven’t you guessed the theme
The painting is not nasty,
it reflects the ages through which we have been
The top of golden plate had the tricolor Indian flag
My eyes went wet, as emotions I couldn’t bag
The sun marked 60 shows the year, we are free
Group of birds are religions,
branches of the same Indian tree
Patches of wheat and pulses, made the” INDIA” word
And dark clouds were obstacles, trying to part the birds
Charkha to laptop is the transformation we have seen
Desert and mountain showed
the “THAR” and “HIMALAYAN” queen
3 sides water are nothing but the oceans around
Now as I guessed the theme, my joy felt no bound

Hail to the painter he’s patriotic indeed
For he showed over mother land 60 years since freed
Come along, my countrymen, let’s take a holy pledge
We will strive towards excellence from edge to edge
We are the best no doubt, now it’s our turn to rule
Let’s work hand in hand and enlarge the talent pool
May our spirits be high higher than any peak
For ours is now the era, we are no more weak
This is not the ending, it’s just another start
I wish I could show you this beautiful work of art

Saturday, February 9, 2008

याद चली आती है ....................


This one one of the poems very close to my heart.....i have always feared to put my such poems on the blog......donno what people would feel and think...dont know what made me write this....please excuse me if something doesnt fit...this is a very long poem...very sry fr that ,but couldnt have written in less than this......read only if u r patient........

याद चली आती है ....................

जब दूर नीले आसमान में,सूरज कहीं छुपता सा लगता है ,
जब
ठंडी हवा ,धीमें धीमें ,कानों में गुदगुदी कर जाती है ,
जब
उड़ती चीड़िया की हलचल ,फूलों के रंग कुछ पराये से लगते हैं,
तब
ठंडी साँसों में जान भरतीउसकी याद चली आती है ,


मैं कमरे की दीवारों को देखता ,कुछ यादें समेटता हूँ ,
आँखों के परदे पर ,उन्हीं हसीं लम्हों को फ़िर फ़िर देखता हूँ ,
खुद से अनजान मैं , जाने कब तक यूं ही सोचता हूँ ,
खीलते होठों की हँसी ,आखों की नमी दोनों को रोकता हूँ
मेरी इस बेबसी से अनजान है वह ,सब जान के भी नादान है वह ,
जब सब्र का बाँध टूटता है ,तो वह आँसू बन आती है ,
बेबस मैं रह जाता हूँ ,जब उसकी याद चली आती है ,

समय फिसला जाता है ,बाहर अँधेरा छाता है ,
पर मैं यादों की रोशनी में ,कहीं खोया सा रह जाता हूँ ,
बहुत कुछ सोचता हूँ ,पर कुछ कह पाता हूँ ,
काश मेरे दील की बात ,आँखों से समझ जाती वो ,
मेरे अधूरे सपनों को ,पूरा कर जाती वो ,
फिर मेरे दील को ,इन शब्दों का सहारा होता ,
कश्ती में तुम साथ होती ,तो मैं भटका किनारा होता ,
खुद से गद्दार बन मैं ,बहुत रीत से भूलता हूँ उसे ,
वो तो चली गयी ,पर जालीम यादें नहीं जाती हैं
लाख कोशिश करूँ ,पर उसकी याद चली आती हैं ,

दोस्त कमरे मैं झाँक ,मुझे पत्थर सा बेजान पाते है ,
कोई खाने को बुलाते है ,कोई खेलने बुलाते है ,
पर मैं खुद से मजबूर ,खुद में कुछ खोया सा पाता हूँ ,
ग़म के घाव पर हँसी की चादर बिछाए बहाने बनाता हूँ ,
मेरी कीस्मत है की ,वो जान नहीं पाती क्या बात है ,
क्यों बाहर पूनम की रोशनी है ,मेरे दील में काली रात है ?
वो मुझे दुनीया को ख़ुशी का मुखौटा दिखाना सिखाती है ,
फ़िर हँसी को सीसाकीयों मैं बदल उसकी याद चली आती है ,

सोचता हूँ ,क्यों ये दर्द मैंने ही पाल रखा है
शाम से सुबह तक का सफर ,क्यों गम में काट रखा है ,
हाँ ,गलती मेरी थी ,मैं उसे कुछ कह पाया ,
पर उस छोटी ग़लती का ,इतना बड़ा साया???
कब तक ,आखीर कब तक ,यूँ ही यादों से लड़ता रहूँगा ,
यूँ ही कमरे की दीवार पर ,उन्हें समेट ,सड़ता रहूँगा ,
रह रह कर वह फिर हसीं सपने दिखाती है ,
और मैं लाचार रह जाता हूँ , जब उसकी याद चली आती है ,

अब तो लगता है दीवारों का दृश्य भी धूमील सा हो गया है ,
साँसों की सीसकीयाँ बन ,धड़कन से मिल गया है ,
अब ज़्यादा देर और नहीं खुली रहेंगी ये पलकें ,
दम
भी घुटना शुरू हो गया है हलके हलके ,
पर फीर भी जाने ,क्यों एक आस बाकी है ,
एक बार ,सिर्फ एक बार,तुम्हें देखने की प्यास बाकी है .
मैंने तो रिश्ता तुमसे जोड़ा था , तुम्हारी यादों से नहीं ,
वफादारी भी तुम्हीं से निभाई थी तुम्हारे वादों से नहीं
तुम आओगी जरूर ,ऐसा वीश्वास है मेरा ,
साँसों के चलते आओ ,या सफ़ेद चादर तान लेने के बाद ,ये चुनाव है तेरा

और ये जो तुम्हारी बचपन से आदत है,हमेशा देर से आने की
और फिर देर हो जाने के मुझे हज़ार बहाने बताने की ,
अब देर हुई तो बहाने किसे सुनाओगी?
कयोंकी तुम मुझे फूल लीये इंतजार करता नही , इंतजार का शहीद पाओगी .
और हाँ ,अगर तुम अब भी सोचती हो की नखरे देख तुम्हारे मैं मान जाऊंगा
आंखों के आँसू और मुह पर "माफ़ी " के जज्बात पहचान जाऊंगा ,
तो तुम शायद आज भी सही हो ,
हाँ हाँ ,शायद तुम आज भी मजबूत हो मेरी कमजोरी के आगे ,
कयोंकी मेरी डोर तो आज भी पक्की है कच्चे हैं तुम्हारे ही धागे ,


सो जाऊंगा ,हाँ हमशा के लीये सो जाऊंगा ,
खो
जाऊंगा,इन्हीं यादों मैं कहीं खो जाऊंगा ,
पर तुम आना जरूर ,भले ,हमेशा की तरह देर से ,
ठंडे हो चुके हांथों को थाम ,कानों मैं कुछ कह जाना जरूर पयार से
वैसे चाहो तो भीगे आंखों को अपनी चुन्नी से पोछ जाना
इस एहसान की कीमत नहीं जानेगा ये ज़माना
कयोंकी मैं ऊपर आसमानों में खड़ा भी तुम्हारा इंतजार करता रहूंगा ,
तन तो धरती पर छोड़ जाऊंगा ,पर यादों से बार बार मरता रहूंगा .
और हाँ मेरे सीने से लिपटा तुम्हारा रुमाल अब तुम ले जाना ,
कयोंकी अब बहुत देर हो गयी,नहीं चाहीए अब मुझे कोई मीलने का बहाना ,


तुम्हारी यादों में मैंने कुछ चीत्र भी बनाए थे तुम्हारे मगर ,
मेरी चीता के साथ जला देना ,बहुत एहसान होगा ,जला सको अगर ,
और हाँ ,तुम्हारी चीट्ठीयां भी फाड़ लेना दीवार से .
कहीं कोई पढ़ ले उन्हें ,भरोसा उठ जाएगा दुनीया का पयार से
जीनदगी
भर जो यादें तद्पाती रही अब वही आराम दिलाती हैं ,
जीवन तो क्या ,मृत्युद्वर तक उसकी याद चली आती है .

ऊपर लीखी हुई मेरी ही कवीता को पढ़ कर मेरे दिल में ये कुछ शब्द रहे हैं,


"
अब अगर आओ तो जाने के लीये मत आना,
सीर्फ एहसान जताने के लीये मत आना,
मुझसे मिलने की नहीं अगर तुम्हें चाहत कोई,
तो
please सीर्फ रस्में ,नीभाने के लिए मत आना